शेयर मार्केट में आवेगपूर्ण खरीदारी किसे कहा जा सकता है? निवेश करते समय स्वयं को ज्यादा "भावुक" होने से रोकने के क्या उपाय हो सकते हैं?

 यह एक कॉमन सी स्थिति है ऐसे ट्रेडर के लिए जो बाजार कि समझ नहीं रखते हैं।

ऐसी स्थिति में ट्रेडर बाजार में ट्रेड नहीं कर रहा होता है बल्कि बाजार से लड़ रहा होता है और उसके दिमाग मे एकही चीज फिक्स होता है कि हुए नुकसान को कैसे भी करके बाजार के मुंह से खींच के ले आना।

हालांकि ऐसी स्थिति में वह जो गंवाया था वो तो है ही लेकिन उसे बचाने में और ज्यादे नुकसान कर बैठता है।

अब एक चीज की परिकल्पना कीजिये।

एक ओर मैं हूँ और एक ओर पहाड़ जैसे खली।

अब यदि मैं खली के सामने गया और उसके जरा से धक्का लगने से नीचे गिर गया।

तो समझदारी कहता है कि मैं उसके सामने चलने से बेहतर है कि या तो उसके पीछे हो जाएं या फिर बगल से निकल जाएं।

ये दोनों ही स्थिति मेरे लिए बेहतर है।

लेकिन अगर मैं यह ठान लूं की खली ने मुझे गिरा दिया तो अब मैं बॉक्सिंग के मैदान में यह सोचकर उलझ जाऊं की मैं भी इसे गिराउंगा।

यदि मैं ऐसा करता हूँ तो रिजल्ट तो पता ही है। ज्यादे कुछ नहीं होगा बस शरीर के कुछ हड्डियां इधर उधर छिटक जाएगा।

बाजार में भी ऐसा ही है। यदि किसी ट्रैपिंग मूव में हम फंस गए और कुछ पैसे का नुकसान कर लिया तो इसका ये कतई ये अर्थ नही है कि जेब मे 10 हजार रखकर 10 हजार करोड़ वाले से लड़ने लगूं। अगर मैं ऐसा करता हूँ तो ये मेरा मूर्खता मात्र रहेगा। समझदारी नहीं।

समझदारी इसी में है कि ऐसे नुकसान के बाद शांत बैठ जाएं और सही समय का इन्तेजार कड़ें। कोशिस करें कि बाजार में बड़े प्लेयर से लड़ने की जगह उनके साथ आगे बढ़ने का।

रही बात इस भावुकता को रोकने का तो यह खुद के अंदर सही समझ बढ़ाने से ही आएगा। यह ऐसी चीज नहीं है जिसे जादू की छड़ी जैसा कोई घुमाए और आवेग खत्म हो जाये।

उम्मीद है पोस्ट आपके लिए उपयोगी होगा।

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