शेयर बाजार में "बड़ी वेल्थ" कैसे बनती है?

 एक रियल उदाहरण पर गौर करें। मेरे आसपास में दो व्यक्ति ऐसे हैं जो सिर्फ खुदरे व्यापारियों को इंट्रेस्ट पर पैसे देता हैं। ऐसे तो बहुत सारे रहते ही हैं हरेक जगह लेकिन समझाने के किए दो को ही लेकर चलते हैं। दोनो ही 5% महीना पर पैसे इंट्रेस्ट पर देता है। सुनने में थोड़ा अजीब लग रहा होगा क्योंकि ज्यादेतर कंपनी 26-27% वार्षिक पर लोन मुहैया करवा देते हैं। लेकिन साहूकार वगैरह का हिसाब किताब ऐसे ही चलता है।

दोनों ने अलग-अलग व्यक्ति को 1-1 लाख रुपये 6 महीने के लिए दिया। ऐसे में 5% के हिसाब से 30000 का रिटर्न्स बनने वाला था।

लेकिन अब यहां से चीजें थोड़ा सा बदलता है

पहला इंट्रेस्ट पर पैसे देकर अगले 6 महीने के लिए सो गया।

लेकिन दूसरा पैसे लेने वाले को प्लान समझाता है। वो उससे कहता है कि देखिये आप 6 महीने बाद हमें 130000 रुपये देंगे। ऐसे में एकबार बड़ी अमाउंट देने में आपको परेशानी हो सकता है।

इसलिये ऐसा कीजिये 6 महीने में टोटल 180 दिन होता है और आपको टोटल 130000 रुपये देना है। ऐसे के आप रोजाना के हिसाब से 723 रुपया देते चलिये।

आपके सिर पर भी एकबार में इतना पैसे देने का बोझ नहीं रहेगा। ये बात व्यापारी को भी अच्छा लगा की देना तो उतना ही है और रोज का व्यापार चल ही रहा है।

अब यदि गौर करें तो उसे लगाए रकम 138 दिन में ही उसे मिल गया और अब वह वापिस उसे अगले काम पर लगा सकता है।

वहीं यदि किसी को सिर्फ 50 हजार की जरूरत हो तो वह मात्र 70 दिन के बाद ही काम पर लगा सकता है।

लेकिन वहीं पहला व्यक्ति मात्र 30 फीसदी कमाया और फिर उसका अगला रुपया 6 महीने बाद काम पर लगेगा।

कुल मिलाकर देखें तो पैसे तो दोनो के पास ही है। कमा दोनो रहे हैं। लेकिन दूसरे ने पैसे का प्रबंधन पहले के तुलना में बेहतर किया तो वो उससे ज्यादे कमा रहा है।

शेयर बाजार में भी बड़ी वेल्थ बनाने का भी यही मंत्र है पैसे का सही रोटेशन। कब एक शेयर से प्रॉफिट बुकिंग करके उसे दूसरे अधिक ग्रोथ सेक्टर में लगा देना।

उम्मीद है पोस्ट आपके लिए उपयोगी होगा।

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